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डेराबस्सी:बस अड्डों के नाम पर दशकों से हो रही वोटों की खेती

June 29, 2020 05:54 PM

 

बस अड्डा किसी भी शहर प्रतीक चिन्ह माना जाता है लेकिन हरियाणा-पंजाब की सीमा पर बसे डेराबस्सी विधानसभा क्षेत्र की विडंबना है कि आजादी के सात दशक बाद भी यहां के लोगों को अदद बस अड्डा नसीब नहीं हुआ है। हर पांच साल चुनावी सीजन में नेता आते हैं और बस अड्डे के नाम पर वोटों की खेती करके चले जाते हैं। रह जाती है बसों के पीछे भागने के लिए मजबूर जनता।
डेराबस्सी पहले बनूड़ विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता था। जिसके चलते वर्ष 1992 में कांग्रेस के महिंदर सिंह गिल ने डेराबस्सी में नए बस अड्डे के निर्माण का वादा किया। जनता ने उन्हें विधानसभा भेज दिया और वह कृषि मंत्री भी बन गए। बाद में बात आई गई हो गई। इसके बाद वर्ष 1997, 2002, 2007 में इस क्षेत्र से विधायक और मंत्री बने स्वर्गीय कैप्टन कंवलजीत सिंह ने भी कभी इस तरफ ध्यान नहीं दिया।

पंजाब में सरकारें बदली पर नहीं बदले डेराबस्सी के हालात

जीरकपुर में हर साल बदल जाते हैं बस ठहराव 

डेराबस्सी:बस अड्डा बना टैक्सी स्टैंड, वोट की राजनीति से कोई नहीं करा सका शिफ्ट

बस अड्डा तो दूर बस ठहराव भी नहीं बन पाया लालडू में

 

 

 

वर्ष 2012 और वर्तमान में यहां के विधायक एन.के शर्मा भी अभी तक धरातल पर कोई परिणाम देने में असमर्थ रहे हैं। कांग्रेस नेता दीपेंद्र सिंह ढिल्लों भले ही चुनाव हार गए हैं लेकिन सरकार के प्रतिनिधि के रूप में काम करते हुए उन्हें करीब ढाई साल हो चुके हैं, उनका भी इस तरफ कोई ध्यान नहीं है। बस अड्डों के नाम पर डेराबस्सी,जीरकपुर व लालडू के लोग कई चुनाव देख चुके हैं।

डेराबस्सी:बस अड्डा बना टैक्सी स्टैंड, वोट की राजनीति से कोई नहीं करा सका शिफ्ट

कलसिया रियासत का सबसे पुराना शहरा डेराबस्सी भी आजतक बस अड्डे की सुविधा से वंचित है। बस अड्डे की इमारत होने के बावजूद यहां कभी बसें नहीं आई। पिछले कई दशकों से बस अड्डे की इमारत को लेकर खींचतान चल रही है। इस इमारत की आधारशिला पांच फरवरी 1970 को तत्कालीन स्थानीय मंत्री मनमोहन सिंह कालिया ने रखी थी।

आज यह पत्थर और यहां बनी इमारत वक्त के साथ धुंधली पड़ चुकी है। पूर्व अकाली-भाजपा सरकार के कार्यकाल के समय डेराबस्सी में शहर से बाहर नया बस अड्डा बनाने की बात चली लेकिन इसके भी सार्थक परिणाम यहां की जनता को देखने को नहीं मिल सके। बस अड्डा परिसर में कई दशकों से निजी टैक्सी चालकों का कब्जा है। वोट की राजनीति के चलते मौजूदा तथा पूर्व पालिका अध्यक्षों ने टैक्सी स्टैंड को यहां से शिफ्ट करने और बसों को अड्डे के भीतर लाने की जहमत नहीं उठाई। क्योंकि 90 फीसदी टैक्सी चालक लोकल तथा आसपास के इलाकों से संबंधित हैं। जीरकपुर की तरह यहां भी चंडीगढ़ की तरफ जाने वाले यात्री सारा दिन बसों के पीछे भागते रहते हैं क्योंकि चालक कभी लाइट प्वांइट के आगे तो कभी पीछे रोकते हैं। बसों के रूकने का कोई स्थान तय नहीं है। राजनीतिक खींचतान के चलते न तो आजतक बसों ने बस अड्डे के भीतर आना शुरू किया है कि और न ही लोगों की समस्या का समाधान हुआ है।

 

जीरकपुर में हर साल बदल जाते हैं बस ठहराव

जीरकपुर को गेटवे ऑफ पंजाब कहा जाता है। चंडीगढ़ के बाद यह पंजाब का पहला कस्बा है। यहां से रोजाना हजारों की संख्या में लोग पंचकूला, पटियाला, अंबाला व चंडीगढ़ के लिए जाते हैं। शहर भूगौलिक स्थिति से इस शहर का महत्व काफी बढ़ चुका है। इसके बावजूद यहां आजतक बस अड्डा नहीं बन सका है। यहां एक बस ठहराव पंचकूला के लिए, एक बस ठहराव चंडीगढ़ के लिए, एक बस ठहराव पटियाला के लिए तो एक बस ठहराव दिल्ली अथवा अंबाला के लिए बनाया गया है। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से कही पर भी यात्रियों की सुविधा के लिए कोई शैड आदि नहीं बनाया गया है।

भीषण गर्मी और बरसात में भी यहां यात्रियों को खुले आसमान के तले खड़े होकर बसों का इंतजार करना पड़ता है। जीरकपुर से दिल्ली व अंबाला जाने वाले यात्रियों को तो शाम छह बजे के बाद जान जोखिम में डालकर बसों का इंतजार करना पड़ता है। क्योंकि जिस स्थान को जीरकपुर परिषद द्वारा बस ठहराव के रूप में आरक्षित किया गया है वहां बिजली आदि की कोई व्यवस्था नहीं है।

यहां करोड़ों की लागत से बनी इमारत का भी राजनीतिकरण हो चुका है और उसका भी बस अड्डे के रूप में इस्तेमाल नहीं हो रहा है।
--जीरकपुर में यहां बन चुके हैं बस ठहराव--
चंडीगढ़ से दिल्ली जाते समय पुल से पहले पैट्रोल पंप के आगे
चंडीगढ़ से दिल्ली जाते समय पुल शुरू होने के साथ
चंडीगढ़ से दिल्ली जाते समय सेठी ढाबा के निकट
चंडीगढ़ से दिल्ली जाते समय सेठी ढाबा व केएफसी के बीच


बस अड्डा तो दूर बस ठहराव भी नहीं बन पाया लालडू में

 

हरियाणा से पंजाब में प्रवेश करते समय लालडू को भी गेटवे ऑफ पंजाब कहा जाता है। महान स्वतंत्रता सेनानी बाबा पिरथी सिंह आजाद द्वारा बसाया गया कस्बा लालडू आज भी बस अड्डे की सुविधा को तरस रहा है। यहां से अंबाला व चंडीगढ़ जाने वाले यात्रियों के लिए बस पकडऩा किसी बड़े युद्ध से कम नहीं। यहां बस अड्डे के नाम पर कुछ भी नहीं है। लोग मुख्य मार्ग पर बने पुल के किनारे खड़े होकर जान जोखिम में डालकर बसों का इंतजार करते हैं। कई बार तो बसों के पीछे भागते हुए बस पकडऩे के चक्कर में दैनिक यात्री हादसों का शिकार हो चुके हैं, लेकिन सरकार को शायद किसी बड़े हादसे का इंतजार है।

पंजाब के अन्य शहरों की तर्ज पर डेराबस्सी,जीरकपुर व लालडू में कब बस अड्डों की इमारतें बनेंगी और कब वहां बसों का आवागमन शुरू होगा यह भविष्य के गर्भ में है।

 
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